
जैसे कि इसका एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है....हम सभी का जाना पहचाना कलाकार....अमिताभ बच्चन,हममें से कई लोगों के लिए वो एक प्रेरणा स्त्रोत हैं....कई तो उनसे इस कदर प्रभावित हैं कि उनकी बीमारी कि ख़बर सुनकरउनके लिए दुआ प्रार्थना करते हैं....यह कर्म जाती-धर्म से ऊपर उठ कर होता है....सभी धर्म के लोग उनके लिए समान प्रेम भाव रखते हैं.यहाँ अगर मैं अमितजी को एक महान सिद्ध कहूं तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी.मुझे उनको एक "सिद्ध कला योगी "कहने में कोई संकोच नही होगा.अगर वो कला के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा विकसित नही करके किसी धर्म या अन्य क्षेत्र में लगे होते तो भी शायद वे उतने ही सफल और सिद्ध होते.इस विषय को समझने के लिए ये उदाहरण सटीक था,इसलिए ही उपयोग किया गया इसे उदाहरण कि तरह ही लेना चाहिए न कि झूठी चापलूसी के रूप में.
इसी तरह विश्व सुंदरियां को भी इस विषय में उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है....उनकी वेशभूषा चाहे कैसी भी रहे....शालीन या अश्लील...उन्हें वहाँ तक पहुँचने में उनकी "रूप सिद्धि" साधना का अपना स्थान है.इससे भी सरल उदहारण हमें अपने घर के आस-पास ही मिल जाएगा....कोई भी शरारती बच्चा,जो कि अन्य बच्चों कि अपेक्षा ज्यादा शरारती है...और उसके पास उसका अनुसरण करने वाले बच्चों का समूह भी होता है.इस शरारती बच्चे को यदि "शरारत सिद्ध" कहें तो कोई बड़ी बात नही होगी,लेकिन उसकी ये सिद्धि अनियंत्रित कहलाएगी....जिसे सही दिशाधारा की आवश्यकता है.इसलिए ही प्राचीनकाल में "शरारत सिद्ध"कृष्ण को संदीपनी आदि गुरुओ के पास भेजा गया था.इसी तरह कई और भी उदाहरण हैं जहाँ गुरु बच्चों को सही दिशाधारा देकर उनकी सिद्धियों को जागृत करके उन्हें को वापस करते देते थे,जैसे चाणक्य और चन्द्रगुप्त...
सिद्धि हर एक के पास होती है,उसका सही दिशा में उपयोग करना हमारे हाथ में होता है.एक ही माता-पिता की संतान अलग-अलग प्रकृति के लोगों के संपर्क में आकर उन्ही की तरह बन गए...ऐसी कई कहानियाँ हमने सुनी हैं और अपने आस-पास देखी भी है.इसी तरह कई ऐसे व्यक्ति भी हैं,जो कम पढ़े लिखे होने के बावजूद भी सफल व्यापारी,कलाकार आदि बन चुके हैं....ये भी कह सकते हैं की उन्होंने ख़ुद को सिद्ध किया है
कहने का अर्थ है कि सिद्धि पाने के लिए साधना कि जरूरत तो होती है लेकिन उसके लिए ये जरूरी नही की बैठ कर पूजा पाठ की जाए.....साधना अपने काम की भी की जा सकती है....जैसा की उपरोक्त उदाहरणों से समझा जा सकता है.जरूरत है अपने अन्दर मौजूद सिद्धियों को पहचानने की और उन्हें साधना के द्वारा सिद्ध करने की.